वो दिन गए…a Nostalgia !

Nostalgia

औऱंगाबाद का सच और खंड-खंड.हुई दूर जाने की हिचक..

इलाहाबाद के बाद औरंगाबाद….दिल्ली से सचखंड एक्सप्रेस जाती है डायरेक्ट औरंगाबाद…मैंने भी उसी ट्रेन का दामन पकड़ लिया। जिंदगी में पहली बार अपने घर से इतनी दूर जा रहा था, वो भी अकेले।….मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन मम्मी को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। जब मैंने घर पे बताया था कि नौकरी लग गई लेकिन औरंगाबाद जाना पड़ेगा तो सबके चेहरे पे हवाइयां उड़ गई थीं। मम्मी तो रोने लगी थीं- ”जाए द बहुत नोकरी मिली, हातना दूर जइला के कउनो जरुरत नइखे…”…पापा घर पे नहीं थे, गांव गए हुए थे. मैं उनसे मिलने, इन फैक्ट उनकी आज्ञा लेने भाई साब के साथ गांव निकल गया। वो वहां मस्ती में गांव का मजा ले रहे थे। पापा को गांव में बहुत अच्छा लगता है। खैर, जब उन्हें मालूम हुआ कि औरंगाबाद जाना है तो एकबारगी तो वो भी बोल पड़े – ”ना”…लेकिन मैं जानता था ये नौकरी मेरे लिए कितनी अहम थी। मैंने अपनी पूरी कोशिश कर ली पापा को कन्विन्स किया, और आखिर वो मान भी गए। अभी तक मुझे सेलरी क्लियर नहीं थी कि कितनी मिलेगी। इसलिए मैं 6 हजार ही बता रहा था। इस बात पर भी वो नाराज थे कि महज इतने पैसों के लिए इतनी दूर जाने का क्या मतलब?…खैर, जाने की अनुमति मिल गई मुझे। अगले दिन मैं निकल पड़ा था दिल्ली।…यही सारी बातें दिमाग में उमड़-घुमड़ रही थीं, ट्रेन दौड़ती जा रही थी रेल की पटरियों पर…और मेरा मन पटरियों की तलाश में जा रहा था एक बिल्कुल नए अनजाने शहर की ओर….। खैर, 28 अप्रैल 2006 की दोपहर मैं औरंगाबाद की धरती पर था। अगले कई महीनों के लिए वो मेरी कर्मभूमि बनने वाली थी। स्टेशन पर मैंने लोकमत के बारे में पूछा कि भइया इसका ऑफिस कहां है..ज्यादातर को तो समझ में ही नहीं आया कि मैं पूछ क्या रहा हूं, वजह सब के सब मराठी मानुष थे, फिर भी जिन्होंने समझा उन्होंने थोड़ा बहुत बताया। मैंने ऑटो कर लिया, और कहा कि लोकमत भवन चलो, वो चलने लगा। मैं मीटर देख रहा हूं तो वो बढ़ा धीरे चल  रहा है, 2, 3..4..मैं बड़ा खुश हो गया, अरे वाह, यहां तो मीटर बड़ा धीरे चलता है या ऑटो का भाड़ा ही काफी कम है।…लेकिन जल्द ही मेरी ये सारी खुशफहमियां दूर होने वाली थीं। लोकमत भवन आ गया..और मीटर में 5.1 हो रहे थे. ..मैंने ऑटो रुकवा कर पूछा लोकमत का ऑफिस यही है, गार्ड्स ने कहा- हां, यई है..बोलो क्या काम है। मैंने कहा – लोकमत समाचार के ऑफिस जाना है…”अरे वो तो उदर है उदर पता करो यहां से ऑटो हटा रे”…मैं खिसक लिया ऑटोवाले से बोला- ”अच्छा जरा इस बिल्डिंग के पीछे ले चलो”…वहां जाने पर देखा एक बड़ा सा गेट है लेकिन लगता नहीं कि बड़ी गाड़ियों के अलावा कोई उधर से आता जाता होगा। मैं वापस उसी मेन गेट पे आ गया और बोला – ”भई, लोकमत समाचार जाना है, अमिताभ श्रीवास्तव से मिलना है”…”ओ तो अइसा बोलो ना बाबा,..अरे अमिताब जी से मिलने का है…अबि तो वो मीटिंग में है…कुछ देर वेट कर लो…क्या नाम है तुम्हारा…” ” मिथिलेश”…”क्या…निर्खिलेस..” ”नहीं, नहीं मिथिलेश, मिथिलेश श्रीवास्तव…” ”हो निर्खिलेस हो या मिर्खिलेस…नाम लिख दो साब…”…….

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अप्रैल 9, 2009 - Posted by | एक अनजाना शहर औरंगाबाद, नहीं भूलेंगी अंजता-एलोरा की गुफाएं

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